एक आवाज “मुझे भी सपनो में जीने दो”

by Sunil Kumar (ASER UP)

 

आत्म विश्वास से लबरेज कविता नामक लड़की से मेरी मुलाकत उसके ही स्कूल में हुई | स्कूल की अध्यापिका से बात-चीत करने के बाद पता चला कि वह स्कूल की काफी होनहार छात्रा है | कविता कक्षा 10 में पढ़ती है | वह अपनी  बहन के साथ स्कूल आती है | चूँकि  वह गणित में कमजोर है, उसने अपने विषय चयन में गृहविज्ञान ले रखा है | पढाई में उसके पापा उसकी रोजाना एक घंटे मदद करते हैं | पापा डाक्टर है और उसको भी डाक्टर बनना देखना चाहते हैं | कविता लेकिन आगे चलकर अध्यापिका बनना चाहती है | उसे डाक्टर बनना पसंद नहीं | अध्यापिका बनने के लिए कौन-कौन से मापदंड होते है, कविता को यह नहीं पता | उसे बस पढ़ना है, खूब पढ़ना है |

दुखी मन से कविता बताती है कि गावं  में लड़के और लड़कियों में भेदभाव किया जाता है | लड़को को पढ़ाई में ज्यादा मौके मिलते हैं  तथा कहीं भी जाने की अनुमति | लड़कियों पर कई पाबन्दी रहती है और अकेले कहीं जाने की अनुमति भी नहीं मिलती | गावं में अंध-विश्वास और लड़कियों के साथ हो रहे इस भेदभाव से वह दुखी है |

बातचीत के दौरान हमें पता चला कि कविता एवं उनके जैसे अन्य बच्चे जीवन जीने की उड़ान उड़ना चाहते है पर सामाजिक और घर की बंदिशों  के कारण उसे लगता है कि वह अपने सपने पूरे नहीं कर पाएगी | गावं के बहुताय माता-पिता का कहना है, “पढ़ा लिखा कर क्या करेंगे? लड़की है इसे आगे चूल्हा-चौका ही तो करना है |” माता-पिता की इस बात से कविता तथा उसके जैसी  अन्य लडकियों  को अपने सभी सपने टूटते नजर आते हैं | उन्हें लगता है कि वे घर की चारदीवारी  में कैद एक वस्तु  की तरह हैं, जिसे केवल घर के काम में ही आना है |

गावं में भेदभाव और अंधविश्वास के साथ-साथ गावं  में फैली गंदगी और सकरी गलियां भी कविता को परेशान  करती हैं  | वह बताती है कि अगर आगे चलकर प्रधान बनी तो सबसे पहले गावं में फैले भेदभाव और अंध-विश्वास को ख़त्म करेगी और सड़के चौड़ी करवाकर गाँव को साफ रखने का काम करेगी | कविता स्कूलों में सरकारी नीति के द्वारा मिल रहे वजीफे से नाराज है क्योंकि एक विशेष वर्ग के बच्चों को दिए जाते हैं | उस लड़की का  सरकार से सवाल  है कि क्या स्कूल में पढ़ रहे अन्य वर्ग के बच्चों को वजीफे की जरुरत नहीं है ? स्कूल में ऐसे भी गरीब बच्चे हैं जिन्हें वास्तव में सहयोग की जरुरत है | कविता इस तरफ की नीति का विरोध करती है और दुखी हो जाती है | कविता का मानना है ऐसा भेदभाव नहीं होना चाहिए |

समाचार पत्रों  के माध्यम से कविता को देश-प्रदेश में घटित सामयिकी घटनाओ की जानकारी रहती है | वर्तमान के मुख्यमंत्री, प्रधानमंत्री और राज्यपाल  के बारे में उसे पता है | वह गावं  में रहना चाहती है फिर भी उसने कहा, “अगर मुझे बाहर नौकरी मिलती है तो मम्मी-पापा  को भी ले जाउंगी क्योंकि मैं उनसे बहुत प्यार करती हूँ |

कविता की बातों और भावनाओं को समझ कर मैं कह सकता हूँ कि हमारे देश  में आज भी बहुताय युवतियां है जिनकी  हर इच्छा उनके मा-बाप  की  होती हैं | वे सपने तो देखती हैं लेकिन उनके सपने सामाजिक भेदभाव, गरीबी, और  माँ-बाप की  इच्छाओं  के आगे दम तोड़  देते  हैं | अगर कविता या उसके जैसी अन्यं लड़कियों को अपने सपने साकार करना  है तो  देश के  हर माँ-बाप, समाज को, अपने बच्चों  के सपने  देखना और उसे  प्राप्त  करने  में  अपेक्षित सहयोग  करना  होगा  और याद रखना होगा कि कल्पना चावला भी एक लड़की थी जिसने आसमान में भी अपना नाम लिख दिया है !

हमें दिल से प्रत्येक  युवा को सही मार्ग दर्शन  और लक्ष्य  प्राप्त के लिए  उचित वातावरण प्रदान  करना  होगा  ताकि उन्हें भी खुले अवसर मिले सके |

194 thoughts on “एक आवाज “मुझे भी सपनो में जीने दो””

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