कहाँ खड़े हैं गाँवों के युवा ?

By Anant Vyas, MME Unit

 

आखिर हम सर्वेक्षण वाले गाँव में पहुँच ही गए | जिला मुख्यालय से लगभग 40 किमी दूर गाँव तक पहुँचने के लिए सार्वजनिक परिवहन के 4 साधन और कुछ पैदल यात्रा का अच्छा अनुभव रहा | अभी भी गाँव का चित्र आँखों के सामने घूम रहा है | 30 बच्चों के नामांकन और 1 शिक्षक वाली एक राजकीय प्राथमिक शाला के अलावा और कोई सरकारी या निजी संस्थान नहीं है गाँव में | कुछ घर कच्चे हैं, कुछ पक्के और अधिकतर घरों के मुखिया या परिवार का कोई सदस्य मुंबई, नागपुर आदि शहरों में प्रवासी हैं | गाँव में कुल दो दुकानें हैं जिन पर सामान्य जरूरतों की सामग्री उपलब्ध है | चाय नाश्ते की दुकान की जरूरत गाँव में शायद नहीं है क्योंकि हमारे व्यक्तिगत अनुभव से ऐसा प्रतीत हुआ जैसे हर घर में चाय नाश्ते की दुकान है | बिजली ने लगभग हर घर तक पहुँच बना ली है परन्तु मनोरंजन और जानकारी बढ़ाने वाले साधनों ने कुछ ही घरों में प्रवेश किया है, ज्यादातर अभी भी कतार में हैं | कुछ बंद घरों के बाहर लटके हुए ताले और उन पर जमीं हुई धुल, कुछ अलग ही कहानी सुना रही है |

ग्राम पंचायत से गाँव को जोड़ने वाला मुख्य रास्ता कच्चा है और लगभग तीन किलोमीटर की इस दूरी को पूरा करने में अपने पैरों का ही सहारा मात्र है | गाँव का नक्शा बनाते समय प्रशिक्षण में बताये गये निर्देश याद आने लगे | एक ही जगह बसे हुए गाँव को चार हिस्सों में बाँटना था परन्तु समझ नहीं आ रहा था कि गाँव में कहाँ से,किस हिस्से में सर्वेक्षण शुरू करें और कहाँ खत्म | पहले दिन बस इतना ही कर पाए कि सरपंच से मिले, गाँव का भ्रमण कर नक्शा बनाया और नक़्शे को चार हिस्सों में बाँटने के पश्चात सर्वप्रथम पहले हिस्से के मध्य से आवासी युवा वाले एक घर का सर्वेक्षण किया |

दूसरे दिन की कहानी भी जुदा नहीं थी | सुबह के निकले हुए दोपहर को गाँव पहुंचे और अँधेरा होने तक गाँव में निर्धारित आधे घर भी सर्वे नहीं हो पाए थे | बाएं हाथ के नियम, पांचवे घर के नियम और 14 से 18 आयु वर्ग के आवासी युवा वाले घर के ही सर्वेक्षण ने ऐसे उलझाया कि गाँव की हर गली में कई फेरे हो गये | लेकिन इनके बिना हम हमारे गाँव की वास्तविक स्थिति कभी नहीं जान पाते और गाँव वालों को भी यह नहीं समझा पाते कि हम क्या और क्यों कर रहे हैं |

पहले दो दिनों की अपेक्षा तीसरे दिन कुछ जल्दी गाँव में पहुंचे, फिर भी शाम 4 बजे जाकर ये अहसास हुआ कि सारे नियम कायदे ध्यान में रखते हुए बचे हुए चार घर भी अच्छे से सर्वे हो ही जायेंगे | आखिर शाम 8 बजे के आसपास हम सुकून से अपने आवास पर थे |

इन तीन दिनों में हमनें क्या जाना, इसको शब्दों में बयां नहीं कर सकते हैं लेकिन ये दिखा कि ज्यादातर सर्वेक्षित युवा बाएं हाथ से लिखते हैं, लगभग सभी की माता कभी विद्यालय नहीं गयी, पिता ने प्राथमिक से उच्च प्राथमिक के बीच ही शिक्षा ग्रहण की, अधिकतर लड़कियों ने उच्च प्राथमिक तक आते-आते पढाई छोड़ दी जिसका एकमात्र कारण विद्यालय का गाँव से बहुत दूर बहुत दूर होना था | लड़के जो पढ़ रहे हैं या पढाई छोड़ चुके हैं उनमें से शायद ही किसी को आई.टी.आई, पोलिटेक्निक, व्यवसायिक शिक्षा, इन्टरनेट जैसे भारी-भरकम शब्दों से कोई नाता रहा है और ना ही वित्तीय साक्षरता और आकांक्षाओं के प्रति कोई सोच ही बनी है | जितने युवाओं का सर्वेक्षण किया गया, उनमें से शायद ही किसी का स्वयं का बैंक में खता है | सामान्य पढ़ने और गणित करने की दक्षता भी कक्षा के स्तर से पीछे ही है |

हमें ये बताया और सिखाया गया था कि एक सर्वेक्षण करने जाना है, अच्छे से करना है और सीखना है | हमनें अच्छे से सर्वे किया और प्रशिक्षण और गाँव में बहुत कुछ सीखा भी |

लेकिन इन तीन दिनों के सर्वेक्षण के बाद अब हमारे समक्ष चर्चा के लिए एक यक्ष प्रश्न था | जिला मुख्यालय परतकनिक (डिजिटल), योग्यता (स्किल), शिक्षा का अधिकार, लैंगिक समानता और भविष्य के सपनों के रास्तों का शोर है, संसाधनों का ढेर है परन्तु यहाँ से 40 किमी दूर तक भी इसकी गूंज और अहसास नहीं है | अभी तक किताबों में पढ़ते आये हैं कि भारत कृषि प्रधान देश है, लगभग 70% आबादी गाँवों में निवास करती है, 69% ग्रामीण साक्षरता दर है आदि आदि परन्तु शायद ये नहीं पता है कि इस आबादी के युवा क्या करते हैं, क्या करना चाहते हैं और क्या करना चाहिए | क्या ऐसा केवल इसी गाँव में है या और भी गाँवों में ऐसा है या सम्पूर्ण ग्रामीण राजस्थान या सम्पूर्ण ग्रामीण भारत में भी ऐसा ही कुछ देखने को मिलता है और यदि हाँ तो इस प्रश्न का प्रति उत्तर क्या है और साथ-साथ एक जिज्ञासा और शंका शहरी और अर्ध शहरी युवाओं की स्थिति के प्रति भी बनती है |

  • Renu Seth

    Very good to read the experiences Anant.