कहीं धूप कहीं छाँव, कैसे बढ़ाऊ अपने पांव

By Manoj Kumar Sharma

बियॉन्ड बेसिक्स असर सर्वे के दौरान हम बिजनौर जिले के दो अलग-अलग ब्लाक के गाँवो में मॉनिटरिंग के लिए गए|  हमारे साथ कृष्णा कालेज बिजनौर से MSW के छात्र हमजा और चारुल एवं दूसरे गाँव में शौरभ और रिवेक थे| दोनों गांवों में हमें दो अलग तरह की सोंच रखने वाली युवतियां मिली जिनकी कहानी कुछ यू है –

नुरफ़शाह – नुरफ़शाह अपने अम्मी और अब्बू के साथ एक छोटे से घर में रहती है| उनके अब्बू मजदूरी करके घर का खर्च उठाते है| नुरफ़शाह ने कक्षा-8 के बाद पढाई छोड़ दी है| इनकी उम्र 14 साल की है| पढाई छोड़ने का कारण पूछने पर उनका कहना था, “हमें पढ़ना अच्छा नहीं लगता है हमें तो बस घर में रहना है अम्मी अब्बू के पास, हमारा घर ही हमारी दुनिया है हमें नहीं जाना घर या गाँव के बाहर”|

नुरफ़शाह की अम्मी नूरजहाँ का कहना था कि हम मजदूरी करके भी अपनी बिटिया को पढ़ना चाहते हैं पर ये पढ़ना ही नहीं चाहती|  बातचीत के दौरान हमे भी लगा की उनकी अम्मी सही कह रही हैं क्योकि नुरफ़शाह ने खुद ये स्वीकार किया की हमारी अम्मी अब्बू तो चाहते है की मै पढू लेकिन हमें नहीं जाना घर से बाहर| नुरफ़शाह ने आजतक अपना पूरा गाँव नहीं देखा है,वो घर पर ही साड़ी में कढ़ाई का काम करती है| इस काम के लिए उन्हें महीने दो महीने पर एक बार पैसे मिलते हैं|

नुरफ़शाह से बातचीत के दौरान हमें लगा कि इनके लिए बाहर की दुनिया एक डरावने सपने से कम नहीं है जिसमे लड़कियां कही भी सुरक्षित नहीं हैं| उनके घर और गाँव के माहौल का असर उनके उपर साफ दिख रहा था| उनके हाथ का हुनर देख के कोई कह नहीं सकता की वो पढाई छोड़ चुकी हैं| उनका हुनर उन्हें बार-बार आगे बढ़ने को प्रेरित करता था लेकिन मन में बैठा डर फिर से उसे घर की सीमा में खीच ले आता था| उसकी भावनावों को हमने कुछ पंक्तियों में कहने की कोशिश की है-

हुनर बड़ा है पर डर उसपे भारी है,

जिन्दगी जीने की रस्म फिर भी जारी है|

8 के बाद उसने हर घड़ी अपनी,

घर की छहरदिवारी में ही गुजारी है|

क्यों पिता का कन्धा झुका सा रहता है?

क्यों नहीं मुझपे भी फक्र होता है?

क्या दुनिया की सबसे अबला बेटियां ही सारी हैं?

प्रीती – प्रीती एक ऐसे परिवार से है जिसमे हाईस्कूल से आगे कोई नहीं पढ़ा है| प्रीती के माता पिता दोनों ही अनपढ़ हैं| उन्हें अपने बच्चों की उम्र तथा पढाई के बारे में कुछ भी नहीं पता |पूछने पर वे किसी बच्चे की उम्र सही नहीं बता सके|प्रीटी ने कक्षा 5 पढ़कर छोड़ दिया क्योकि उसके पिताजी ने उसे आगे नहीं पढाया| अभी प्रीती दूसरे के खेतों में गन्ना छीलने का काम करती है| इस काम के उसे सप्ताह में पैसे मिलते हैं पर उसे पैसे गिनना नहीं आता|

जाँच के दौरान ही उसके पिता रामचरन बीड़ी का कस लेते हुए घर से बाहर आए| मैंने उनसे प्रीती की पढाई के बारे में बातचीत की तो उन्होंने अपनी गरीबी का हवाला दिया| मैंने उनसे पूछा की आप एक दिन में कितने बंडल बीड़ी पी जाते है? इस पर वे बोले, “साहब दिन भर में तीन-चार बंडल तो हो ही जावे”| मैंने उनके महीने की बीड़ी का खर्च जोड़कर उन्हें बताया जो पास के प्राइवेट स्कूल की एक महीने की फीस के खर्च से कही ज्यादा था|मैंने उन्हें ये भी  बताया की प्रीती अध्यापक बनना चाहती है तो ना पढ़ाने की ग्लानि उनके चेहरे पर साफ़ झलक रही थी| अंत में उनका कहना था, साहब अब तो हम बीड़ी पीना छोड़कर उस खर्च को बचाकर बिटिया को पढाएंगे और अध्यापक बनाकर ही छोड़ेगे”|

प्रीती की भावना को मैंने कुछ पंक्तियों में लिखने की कोशिश की है-

ना जाने हम कब बड़े हो गए ?

स्कूल के दिन ना जाने कहाँ खो गए?

वो स्कूल के पल लौटकर ना आएंगे |

हम बस उनको याद करके ही खुश हो जाएंगे |

टीचर बनकर पढ़ाने की ख्वाहिश तो पूरी न हुई

घर में छोटी बहन को पढ़ाकर ही खुश हो जाएंगे |

मॉनिटरिंग के दौरान बिजनौर जिले के कई गांवों में हुए अनुभवों को देखकर हम कह सकते है कि आज भी बहुत सारे माँ-बाप ऐसे हैं जो लड़कों को अच्छे स्कूलों में पढ़ाते है लेकिन लड़कियों को पढ़ाने के लिए गरीबी का रोना रोते है| ऐसे माता-पिता के लिए कुछ पंक्तियाँ समर्पित हैं –

बेटा शिक्षित,आधी शिक्षा,

बेटी शिक्षित पूरी शिक्षा |

हमने सोचा, मनन करो तुम

सोचो समझो करो समीक्षा |

बेटी-युग में बेटा-बेटी,

सभी पढ़ेंगे,सभी बढ़ेंगे |

फौलादी ले नेक इरादे,

खुद अपना इतिहास गढ़ेंगे |

बेटी युग सम्मान-पर्व है,

ज्ञान-पर्व है,दान-पर्व है,

सब सबका सम्मान करें तो,

जीवन का उत्थान-पर्व है |

सोने की चिड़िया बोली है,बेटी युग की हवा सुहानी |

बेटी-युग के नए दौर की,आओ लिख लें नई कहानी |

उपरोक्त दोनों अनुभवों के आधार पर हम यह कह सकते है कि हमारे देश में नुरफ़शाह और प्रीती जैसे लाखों युवा के लिए उचित मार्गदर्शन,आर्थिक स्थिति, सामाजिक भेदभाव, स्कूलों का अभाव, अभिभावकों का अनपढ़ होना जैसी कठिनाइयां आगे की पढाई में रोडा बनकर खड़ी हो जाती है जिनसे इन्हें असमय अपनी पढ़ाई छोड़नी पड़ती है |

355 thoughts on “कहीं धूप कहीं छाँव, कैसे बढ़ाऊ अपने पांव”

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