मंजिल है हौंसला है…. पर राह कौन दिखाये?

संदीप शर्मा, असर सेंटर, उत्तर-प्रदेश

पिछले 11 वर्षो में हमने असर के माध्यम से देश के 5-16 वर्ष तक के बच्चों के शैक्षिक स्तर को जाना है,परन्तु असर 2017 नया है |  असर 2017 देश के 14 से 18 वर्ष के युवाओं की जागरूकता, क्षमताओं और आकाँक्षाओं को जानने की कोशिश कर रहा है |

इस वर्ष हम उत्तर-प्रदेश के 2 जनपद में यह सर्वेक्षण कर रहें है जिसमे पूर्वी उत्तर प्रदेश से वाराणसी तथा पश्चिमी उत्तर प्रदेश से बिजनौर जनपद सम्मलित हैं | प्रत्येक जनपद के 60 गावों में स्वयंसेवियों के माध्यम से यह सर्वे हो रहा है | इसी सिलसिले में मेरा बिजनौर आना हुआ | बिजनौर जनपद में असर सर्वेक्षण कृष्णा कॉलेज के मास्टर ऑफ़ सोशल वर्क के छात्रों द्वारा किया जा रहा है | 4 दिवसीय प्रक्षिक्षण के बाद समय था गाँव में जाकर सर्वेक्षण संपन्न करने का |

सर्वेक्षण का वो दूसरा दिन था और मैं एक गाँव में मॉनिटरिंग के लिए गया | घरों के चयन के दौरान हम एक घर में पहुंचे | सामने देखा तो एक व्यक्ति बड़े ही ध्यान से मिट्टी के बर्तन बनाने में व्यस्त था | हम लोगों ने उन्हें अपने आने का उद्देश्य बताया और पूछा कि उनके घर में कोई 14 से 18 साल का लड़का या लड़की है | इस पर उन्होंने अपनी लड़की, राधिका को बाहर बुलाया और हमने सर्वे शुरू किया |

राधिका 18 वर्ष की युवती थी जो बी.एस.सी के प्रथम वर्ष में पढ़ रही थी | घर की दशा देख कर यह पता चल रहा था कि राधिका एक गरीब परिवार से थी | राधिका की माताजी का निधन 4 वर्ष पूर्व हो चुका था और इसी कारण घर के सभी कार्यों की जिम्मेदारी उसके ऊपर थी | उसके पिता कुम्हार थे जो मिट्टी के बर्तन बना कर परिवार का पालन-पोषण करते थे | गरीब होने के बाबजूद भी वे अपने बच्चों की पढ़ाई को लेकर बहुत जागरूक थे |

सर्वे के दौरान राधिका के पिता जी भी अपना काम छोड़ हम लोगों के पास आकर बैठ गए और पूरी प्रक्रिया को बड़े ध्यान से देखने लगे | राधिका से बातचीत के दौरान उसने बताया कि वह एक शिक्षक बनना चाहती है,परन्तु वह यह नहीं जानती थी कि शिक्षक बनने के लिए उसे क्या करना होगा | उसका यह कहना था कि,”जब पढ़ लेंगे तब पता चल जायेगा कि कैसे शिक्षक बन सकते हैं |” उसके बाद राधिका ने असर टूल की कहानी भी फटा-फट पढ़ दी पर गणित में राधिका काफी कोशिशों के बाद भी घटाव के सवाल हल नहीं कर सकी | हमने राधिका की जाँच पूरी की और घर से निकलने लगे | तभी राधिका के पिता जी का सवाल आया जो अक्सर माता-पिता सर्वेक्षण के दौरान हमसे पूंछते हैं, “साहब कैसी है हमारी बिटिया पढ़ने में ?” हमने राधिका के पिता जी को बड़ा सधा हुआ जबाब दिया कि पढ़ने में अच्छी है पर गणित पर थोड़ा ध्यान देने की जरुरत है |

हम अगले घर में सर्वेक्षण कर ही रहे थे तभी वहाँ राधिका आयी और बोली,” भईया, मेरी जाँच आप एक बार और कर लो| मेरे पापा नाराज़ हो रहे है कि तुम्हें घटाव के सवाल भी नहीं आ रहे है और बी.एस.सी. कर रही हो |” मैंने उसकी बात मान ली और कहा की एक घर का सर्वे पूरा करके हम फिर उसके घर आयेंगे |  हांलाकि राधिका का सर्वेक्षण एक बार हो चूका था हमने उसको वही सवाल फिर से हल करने को दिया | काफी देर कोशिश करने बे बाद भी राधिका ने फिर से सवाल गलत हल किया | कुछ सोच कर राधिका ने हमसे पूछा कि क्या हम गाँव कल फिर आएंगे ? जब हमने हाँ कहा तो वह आग्रह करने लगी “भईया कल मुझे यह सवाल एक बार फिर हल करने देना |” मैंने फिर उसकी बात मान ली |

अगले दिन सर्वे का तीसरा दिन था और मैं उस गाँव से करीब 10 किलोमीटर दूर एक और गाँव में मॉनिटरिंग करने गया | शाम को जब मैं लौट रहा था मुझे राधिका की बात याद आई |  हांलाकि देर हो रही थी मैं राधिका को निराश नहीं करना चाहता था | मैंने अपनी बाइक उसके गाँव की तरफ मोड़ ली और उसके घर पहुंचा | उसे टूल दिया और वो सवाल हल करने बैठ गई | हालाँकि उसे सिर्फ दो सवाल हल करने थे पर देखते-देखते राधिका ने टूल के आठों सवाल सही हल कर दिए | मैं भी हैरान था कि एक दिन में ऐसा कैसे हुआ ? मेरे पूछने पर उसने बताया कि उसने गाँव के एक चाचाजी, जो प्राइवेट स्कूल में पढ़ाते हैं, उनसे मदद ली थी | कॉलेज में अगर पूछती तो सब उसपर हँसते | राधिका के पिताजी ने बताया कि हमारे जाने के बाद, कॉपी-पेन लेकर वह गाँव के मास्टर साहब के पास चली गई थी और फिर देर रात तक पढ़ती रही | उन्होंने कहा, “साहब हम तो अनपढ़ हैं, मेहनत- मजदूरी करके बस पढ़ने के लिए पैसा दे सकते हैं | अब हम कैसे जान पाएंगे कि हमारा बच्चा क्या पढ़ सकता क्या नहीं ? ये तो बच्चा जाने या उसको पढ़ाने वाले |” उनकी बात सुनकर मैं कुछ देर खामोश रहा क्योंकि यह समस्या सिर्फ राधिका के पिताजी की ही नहीं | मैंने न जाने कितने पिताओं की यही समस्या देखी है |

रास्ते में कुछ सवाल मेरे मन में उठ रहे थे | पहला जो राधिका ने बताया था कि अगर कॉलेज के शिक्षक से पूछती तो वो डांटते या उसका मजाक बनाते | बच्चा हो या युवा, सब अपनी जिज्ञासाएं लेकर स्कूल या कॉलेज जाते है और अगर वो अपने अध्यापक से ही कुछ पूंछने या सीखने में हिचकिचाएँगे तो  कौन उनको सही रास्ता दिखायेगा? राधिका जैसे न जाने कितने आत्मविश्वासी, जिज्ञाशु और मेहनती बच्चे होंगे जो सही मार्गदर्शन मिलने पर अपने सपनों को साकार कर सकते हैं |

दूसरा सवाल जो मेरे मन में उठ रहा था उसके पिताजी की बात कि हम कैसे जाने कि हमारा बच्चा क्या पढ़ रहा है? क्या कॉलेज स्तर पर जरूरत नहीं होती कि शिक्षक बच्चों के माता-पिता को उनके शैक्षिक स्थिति के बारे में बताएं?

और अंत में इतना कह सकता हूँ कि “राधिका” जैसे युवा ही हरिवंशराय बच्चन जी की इन  पंक्तियों को वास्तव में चरितार्थ करते है-

“असफलता एक चुनौती है, स्वीकार करो

क्या कमी रह गई, देखो और सुधार करो

जब तक न सफल हो, नींद चैन को त्यागो तुम

संघर्ष का मैदान छोड़ मत भागो तुम

कुछ किये बिना जय जयकार नहीं होती

कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती!!