सफर दिल्ली से कश्मीर तक

 by Vandana Paul                                                            

असर सेंटर में पिछले 9 वर्षों से रहते हुए इस साल पहली बार असर प्रक्रिया को फील्ड में जाकर देखने और जानने का अवसर मिला | बहुत ही उत्सुकता के साथ, असर के साथियों के साथ  मैंने कश्मीर जाना तय किया । कश्मीर के बारे में राय, विचार, मन में बड़े सारे सवाल और थोड़ा सा कश्मीर घाटी के बारे में फैले हुए डर को लिए मैं दिल्ली से श्रीनगर जा पहुँची । मन में सवाल थे सुरक्षा को लेकर । कहाँ रहना, क्या खाना-पीना कैसा होगा और असर प्रक्रिया को लोग कैसे लेंगे | एयरपोर्ट से होटल तक जाते समय जगह-जगह  सी.आर.पी.एफ. के जवान खड़े दिखे | होटल के रिसेप्शन पर मेरा बड़े ही प्यार से स्वागत किया गया। मेरा डर बहुत कम हो चुका था, मुझे कश्मीर दिल्ली जैसा लगने लगा था ।

अगले दिन से बडगाम जिले के ‘जिला शिक्षा एंव प्रशिक्षण संस्थान’ में ‘साक्षर भारत मिशन’ के युवा स्वयंसेवकों के साथ 3 दिन की ट्रेनिंग शुरु होनी थी | उसकी योजना के लिए असर टीम के साथी अपना-अपना काम बताने लगे | मुझे भी एक सत्र दिया गया । अगले तीन दिन ट्रेनिंग थी | ट्रेनिंग में लगभग 76 लोग पहुँचे । इस बार असर में सब कुछ नया था और हम भी यह सुनिश्चत करना चाहते थे कि सभी पार्टीसिपेनट अच्छे से समझ जाए | हर बात को अलग-अलग तरह से समझाने की कोशिश  की गई – कभी मेनुअल रीड करके, कभी प्रोजेक्टर पर फॉर्मेट फील करने की प्रेक्टिस, तो कभी केस स्टडी  देखकर और आखरी में एक सिखे गए प्रोसेस पर क्विज | क्विज में 38 प्रश्न थे जिन्हें चेक करके लैपटाप पर  रिकॉर्ड  करना था | मुझे यह बहुत मुश्किल लगा| देर रात तक सभी लोग चेक कर रहे थे क्योंकि अंतिम दिन किसको सर्वे में भेजना है यह उस पर ही निर्भर था । 3 दिन की ट्रेनिंग के बाद लभभग 55 लोगों का सेलेक्श्न हुआ जो कि 2 वीकेंड में जाकर 60 गाँवों का सर्वे करने वाले थे ।

यहाँ आने से पहले कुछ सवाल और मेरे मन में थे – लड़कियों की परिस्थिति कैसी  होगी तथा उन पर बंदिशें कितनी सारी होंगी ? लेकिन वहाँ जा कर पता चला कि वे भी हमारी तरह जिंदगी को खुशनुमा होकर जीती हैं,  पूरी तरह आजादी से । ट्रेनिंग में 76 लोगों में से 42 लड़कियाँ थीं । उनसे बात चीत के दौरान यह पता चला  कि ये लड़कियाँ सुबह 5 बजे उठती हैं | घर की साफ-सफाई से लेकर खाना पकाने तक का सारा काम करके 2 घण्टे का सफर करके यहाँ पहुँचती हैं । इनका मोटीवेशन समझना ज्यादा मुश्किल भी नहीं था। कश्मीर बहुत अविकसित राज्य है । बाहर से तो यह बहुत अच्छा दिखता है पर अन्दर जाने पर आपको समझ आता है कि यहाँ मूल सूविधाएँ भी ठीक से उपलब्ध नहीं है । सड़कों के नाम पर टूरिस्ट एरिया बहुत अच्छे से कनेक्टेड है लेकिन इंटीरियर के गाँव में जाना हो तो धूल मिट्टी से भरे रास्ते ही मिलते हैं । बहरहाल, मैंने ट्रेनिंग के दौरान कुछ अच्छे दोस्त बनाए – रूही और महबूबा | दोनों ही सुबह घर का काम निपटाकर 2 घण्टे सफर करके ट्रेनिंग में आया करती थी, जिसके लिए उन्हें 3 गाड़ियाँ बदलनी पड़ती थी | ट्रेनिंग को पूरा कर शाम को वह फिर 2 घंटे का सफर तय करके वापस जातीं ।

3 दिनों की ट्रेंनिग के बाद गाँव में सर्वे के दौरान मैं फिल्ड में गई, ओंन-फील्ड सर्पोट के लिए । हमनें गाँवों में सर्वे के दौरान लोगों के डाउटस को क्लियर किया और सर्वे करने में उनकी हेल्प की | गाँवों में सर्वे के दौरान बहुत से लोगों से मुलाकात भी हुई और सभी ने हमारा बहुत अच्छे से स्वागत किया | हर जहग लोग चाय पीने की जिद्द कर रहे थे | एक जगह तो चाय के लिए मना करने पर 2 किलो अखरोट मिला । घरवाले बोले कि ‘‘हम मेहमान को खाली हाथ नहीं जाने देते’’ | कश्मीर और कश्मीर वासियों के लिए मेरे दिल में और इज्जत बढ़ गयी । मैंने ऐसे ही 3 गाँवों का मानिटरिंग किया । टेस्टिंग में बच्चों के प्रदर्शन को देख कर हताशा हो सकती है | यहाँ पर लड़कियाँ लड़कों से ज़्यादा अच्छी तरह और आसानी से सवालों का जवाब दे रही थी । इसके अलावा वे घर का पूरा काम करती है उसके बाद पढ़ाई के लिए समय भी निकालती हैं । जब हम टेंस्टिग कर रहे थे तो वहाँ पर आस-पड़ोस के लोग इकट्ठा हो जाते और कहते कि हमारे बच्चे की भी टेस्टिग किजिए।

बड़ी उम्र के बच्चों को साधारण से सवालों का ना आना गले से नीचे नहीं उतरता । जब मैं यही चीज असर रिपोर्ट में सिर्फ नंबर के तौर पर पढ़ती थी तो मुझे ज्यादा हैरानी नहीं होती थी क्योंकि वह सिर्फ नंबर थे, पर जब कोई यही परिस्थिति खुद अपने घर या पड़ोस के बच्चों में देखेगा तो यह आंकड़ें एक जिम्मेदारी में बदल जाते हैं |  शिक्षा की ऐसी परिस्थितियों को बदलने के लिए भले ही बहुत से कार्यक्रम चल रहे हो पर समय के साथ-साथ परिस्थितियों में बदलाव आने चाहिए, कार्यक्रमों में नहीं | पर ऐसा होता मुझे नहीं दिख रहा क्योंकि मैंने देखा है बच्चों को अभी भी बहुत कुछ  नहीं आता । जैसे आप भी अपने घर और पड़ोस में देखे कि 14-18 वर्ष के बच्चों को क्या बुनियादी ज्ञान है या नहीं ।

अंत में मैं इतना कहना चाहती हूँ कि जितना गलत हम कश्मीर के बारे में आए दिन अखबारों और मीडिया में सुनते है वह मेरी समझ से गलत है । वहाँ के लोगों  का स्वभाव बहुत अच्छा है और वे काफी मिलनसार है । वहाँ के लोग नई चीजों के बारे में जानना और अपने जीवन में उन चीजों का उपयोग करना चाहते है । वह नई सोच के साथ कदम से कदम मिलाकर चलना चाहते है । मुझे जब भी अवसर मिलेगा तो मैं फिर से कश्मीर जरूर जाना चाहूंगी ।