Chalo Bihar : Connecting mission to reality

binäre optionen signale dbswiss – Posted by Dharm Choudhry (ASER Centre Project Coordinator – Rajasthan)
फोन ऐसी तकनीक है जो कभीकभी सुखद सन्देष देती है तो कभीकभीक्या कहूं ? आगे पढ़िये तो जानियेगा।
एक सुबह असर सेन्टर से पूर्णिमा जी का फोन आया और सूचना मिली कि कम से कम 20 दिन बिहार जाकर वहाँ के स्कूलों  का मुल्यांकन  करना है । उस दिन से बस जहन में बिहार के अलावा कुछ नज़र नहीं रहा था। आप सोच रहे होंगे कि मैं काफी उत्साहित होंगा लेकिन नहीं ! जब अपने परिजनों से बिहार के बारें में चर्चा हुई तो उन्होंने चुस्की लेकर बोला कि http://tjez.gob.mx/perdakosis/7722 “बबुआ http://www.tangotec.com/?sitere=triding-binario&08e=a8 बिहार click source link तो go जा go here   source site रहे come farex vederrle partite gratis हो लेकिन वहाँ कुछ भी हो सकता है।लेकिन अपने डर को समेटे हुये बिना किसी से फुसफुसाहट किये मैं 9 मई को दिल्ली पहुँच गया। वहाँ सारी तयारी करने के बाद आखिरकार पटना के लिये हमारा कारवां रवाना हो गया। उस समय एक गीत की दो पंक्तियां मेरे ज़हन में बारबार रही थी  – ‘‘पंखों में आकाश समेटे चले हमारा काफिला, मन में इक विशवास संजोए चले हमारा काफिला|”
पटना में हुये राज्य प्रषिक्षण के दौरान मैं अपने जिले के प्रतिनिधियों से मिला जिनसे सबसे पहली बात किसी प्रकार की हानि नहीं होने से शुरू की | पहले तो वह लोग कुछ मुस्कुराए और कहा श्रीमान कुछ भी नहीं होगा अब वो बिहार नहीं रहा जो पहले था आप स्वयं जाकर देखना कि वास्तविकता में कितना परिवर्तन है।“  इस वार्तालाप से मुझे काफी संतुष्टि मिली और मेरा आत्मविष्वास भी बढ़ा। 
राज्य प्रषिक्षण के बाद फिर शुरू हुआ एक मिशन जो कि पूरे समयसीमा के आधार पर बनाया  गया था। लेकिन उससे पहले ही 18 मई को मैं बीमार हो गयाबहुत भंयकर डायरिया का शिकार हो गया |  दोपहर 2 बजे तक मुझे खड़े होने में भी चक्कर आ रहे थे | मैं दवाई लेने के लिये बाहर आया और लगभग 5 किलोमीटर ऑटो से घूमने के बाद भी मुझे डॉक्टर नहीं मिला क्योंकि उस दिन रविवार था | लेकिन मुझे यह जानकर ताजूब हुआ कि अस्पताल में आपातकालीन डॉक्टर भी नहीं थे। उस समय ख़याल मन में आया कि क्या जीवन मूल्य सेवाओं को भी रविवार की छुट्टी लेने का अधिकार होना चाहिए?  मैंने अपना मन बनाकर एक मेडिकल दुकान से कुछ टेबलेट ली और वापस गया | कुछ देर बाद मैं उसी पीड़ा का शिकार वापस होने लग गया और अब कुछ ज्यादा समस्या होने लग गई थी। यह मेरी जिन्दगी का सबसे भंयकर डायरिया था। अब तक मुझे घबराहट और बेचैनी भी  महसूस होने लग गई थी और मै सोचने को मजबूर हो रहा था कि यह काम अब मुझसे आगे नहीं हो पायेगा। मुझे तो वापस घर चलना चाहिए। लेकिन तब ही अन्दर से एक आवाज आई कि यदि में बीच में चला गया तो मेरी आत्मसंतुष्टि का क्या होगा, मुझे हमेशा  अफसोस रहेगा कि मैं बीच में ही चला आया था। आने के बाद मुझे मेरी अंतरात्मा से ही जंग लड़नी पड़ेगी और जब लोग बिहार के इस मिशन को पूरा करके आयेंगे तो मै उनसे आंखे कैसे मिलाउगां। एक बार तो मुझे बार्डर फिल्म के सूबेदार मथुरादास याद गया जो सीमा पर युद्ध के समय छुट्टी लेकर घर की तरफ आने को तैयार हो गया था। मेरा शरीर मेरा साथ नहीं दे रहा था लेकिन जो जोश और जो सवाल मुझे अन्दर ही अन्दर कोंध रहे थे वे कुछ और ही कह रहे थे। 
कुछ देर बाद मैं फिर  डॉक्टर खोजने निकल गया कुछ दूर चलने के बाद मुझे एक अस्पताल मिला। लेकिन अस्पताल के भी वही हालात, कि श्रीमान डॉक्टर नहीं थे। अब मैं इतना परेशान हो गया था कि मैंने उस रिसेप्शनिस्ट से झगड़ा मोल ले लिया कि डॉक्टर नहीं है तो अस्पताल क्यों खोल रखा है इत्यादि। उस झगड़े का शोर सुनकर एक कम्पाउडर गया। उसने कहा कि डॉक्टर तो नहीं है लेकिन मैं आपकी तकलीफ दूर जरूर कर दूंगा । मेरे पास अपने आप को उस कम्पाउडर के हवाले करने के अलावा कोई अन्य रास्ता नहीं था और मैं आभारी हूँ उस कम्पाउडर का जिसने मुझे चार घण्टे में ऐसा कर दिया कि मुझे ऐसा महसूस ही नहीं हुआ कि मुझे कुछ हुआ भी था !
अब यहाँ से शुरू हुआ ज़िम्मेदारी का कारवां जो कि जिला प्रषिक्षण में शुरू होना था। जब प्रत्येक टीम में D.I.E.T. प्राध्यापक नियुक्त हुये तो मैंने वही से हमारी योजना को मूर्त रूप देना शुरू कर दिया था। मुझे लगा कि शायद मुझे ज्यादा काम करना है इसलिए यह जिम्मेदारी सोंपी गई है। हमने जिले में पहुंचते ही इस मुल्यांकन से संबंधित सरकारी विभाग के उत्तदायित्व व्यक्तियों से मिलना शुरू कर दिया और साथ ही कार्यों का भी बंटवारा कर दिया। तत्पश्चात हमारी मुख्य कड़ी थी D.I.E.T. छात्र, वे ही तो थे जो हमारी मझदार में पड़ी नैया की खिवईया बनने वाले थे। मैने एक घण्टा उनका उन्मुखिकरण किया जिसमें मेरा पैंतरा जोकि मैं हमेशा काम करवाने के लिये उपयोग में लेता हूं की लोगों को संवेदनषील बनाना और उनकी भावनाओं तक उस काम की महत्वपूर्णता को पहुँचाना । मैंने भूमिका में बिहार सरकार द्वारा की जा रही अभीनव पहल का मूल्यांकन करने के लिये असर के निमन्त्रण के बारे में बात की और कहाँ कि हम भारत के प्रत्येक राज्य से आये हैं तो सोचिये आपकी कितनी जिम्मेदारी होगी कि आप हमारा सहयोग करें और आपकी आने वाली पीढि़यों के लिये यहाँ की सरकार द्वारा जो अभिनव पहल शुरू की जा रही है उसकी उपयोगिता के मुल्यांकन में अपनी जितनी ज्यादा भागीदारी हो उसे निभाना। 
इस तरह कैमूर जिले की D.I.E.T. के छात्र, छात्राओं के संवेदनषील पक्ष को मैने झिझोड़ा तो एक आष्चर्यजन परिवर्तन मुझे दिखाई दिया कि लोग काम से और हमसे ऐसे जुड़े मानों किसी जमाने के बिछड़े हुये 60 दोस्त आज यहीं एक जगह मिल गये हो जिनकी सोच एक समान है जो उस काम की सफलता के लिये मानो जी जान भी लगाने को तैयार हैं। जब हम लोग 6 बजे पहुँच जाते थे और शाम को 6 बजे D.I.E.T. से निकलते तो छात्र पूछते कि सर आप दिन का खाना कब खाते हैं? मैंने हल्की मुस्कान के साथ जवाब दिया कि यार चार पाँच दिन एक टाइम खाना खा लेंगे तो मर थोड़े जायेंगे और ऐसा काम रोज़ थोड़े ही करते हैं बस एक बार काम अच्छे से पूरा हो जाये तब जो खाना खायेंगे उसको खाने में जो मजा आयेगा वो मजा इस खाने में नहीं आयेगा | अभी तो सिर्फ बिस्किट खाकर ही काम चला सकते हैं। छात्रों को यह महसूस हुआ कि बाहर से आये हुये लोग इस काम को बेहतर ढंग से सम्पादित करने में खाने तक की परवाह नहीं कर रहे है। इस घटना ने छात्रों को और ज्यादा जोड़ने में हमारी मदद की और हमारे जोश और काम में चार चांद लग गये। इस प्रकार इस मिशन को पूरा करने में हम सभी ने अपनी जान लगा दी और कहीं भी एक सुराक तक नहीं छोड़ने तक की मेहनत की। तब जाकर हम सफलतापूर्वक हमारे जिले में मूल्यांकन कर पाये। 
जब हम लोग आखिर में विदा हो रहे थे तथा साथ ही रिव्यू भी कर रहे थे तब एक छात्र मनीष ने कहा कि सर जब आप प्रायोगिक कार्य में निरीक्षण करने गये तब हमें डर लग रह था लेकिन जब आपने हमारे द्वारा गलत किये जाने पर भी मात्र मुस्कुराकर उसे ऐसे नहीं ऐसे करने को कहकर आगे बढ़ गये तो इससे हमे बहुत सीखने को मिला और हमारा जो डर था वह खत्म हो गया | इस कारण हमने आपसे दूसरे कान्फुजन के बारे में भी पूछा और हमारी बेहतर समझ बनी। 
इस प्रकार काम को करते हुये मैने सिर्फ अपना जो नियमित रूप से खेले जाने वाला खेल ही खेला, वो कहते है ना बेट्समेन तब ही अच्छे रन बना सकता है जब वह अपना नियमित खेले जाने वाला खेल ही खेले। अतः मैने भी वही किया। मुझे यह काम ऐसे लग रहा था जैसे महाभारत में अर्जुन को सिर्फ चिड़िया की आँख ही नज़र रही थी वैसे ही मुझे सिर्फ यह काम बेहतर ढंग से पूरा होता दिखाई दे रहा था। इसी के साथ मेरा अंतर्भाव भी हमेशा यही रहता है कि मुझे जब भी कोई नई जिम्मेदारी मिलती है मेरे दिमाग में उसे अच्छी तरह करने का एक जूनून सवार रहता है, फिर ना भूख लगती है और ना प्यास बस सिर्फ वो काम ही दिखता है। 
इस प्रकार परिकल्पना और हकीकत के बीच चले इस मंथन में जिस हकीकत से मेरा सामना हुआ वह काफी दिलचस्प था | मेरा जो डर था वह एक वहम निकला। वास्तव में बिहार वैसा नहीं है जैसी मेरी या मेरे प्रियजनों की अवधारणा थी