Day 97: हौसलों की उड़ान



यह वर्ष मैरा असर सर्वेक्षण का नौवां वर्ष है। सर्वेक्षण के दौरान मुझे सीतामढ़ी जि़ला के हुमायुपर गाँव जाने का मौका मिला। गाँव जाने के लिए केवल दो बस ही चलती हैं। में सुबह पाँच बजे ही बस स्टैंड चली गयी। बस छोटी थी उसमें केवल 25-30 लोगों के ही बैठने की जगह थी। लेकिन 45-50 लोग बस में सवार हो गए। क्योंकि अगली बस शाम में थी। बस में हवा जाने तक की जगह नहीं बची थी। कुछ लोग बस के ऊपर बैठ गए तो कुछ बस के अंदर खड़े हो गए।

बस स्टैंड से 6 बजे चली, रास्ता बिल्कुल ही कच्चा था। जैसे-जैसे बस आगे बढ़ती थी, ऐसा अनुभव होता था कि बस अब पलटी की तब। डेढ़ घंटे बाद बस स्टैंड पर पहुँची और गाँव स्टैंड से 3 कि.मी. दूर था। गाँव जाने के लिए कोई साधन नहीं था। यहाँ के लोग गाँव पैदल जाते हैं या अपने खु़द के साधनों का उपयोग करते हैं। पैदल चलते-चलते मैं थक चुकी थी। थोड़ी देर बाद, रास्ते में मेरी मुलाकात एक लड़की से हुई, उसकी उम्र लगभग 16 वर्ष थी तथा वह उसी गाँव की रहने वाली थी। उसकी आँखों में एक अजीब सी चमक थी, मुस्कुरा कर उसने अपना नाम मुनियाबताया। उसने मेरा नाम और गाँव आने का मकसद पूछा। वह पास के गाँव से ट्यूशन पढ़कर आ रही थी।

गाँव पहुँचने के बाद, मैं सबसे पहले विद्यालय पहुँची। देर होने के वजह से विद्यालय बंद हो चूका था। तब मैं गाँव में असर फारॅमेट लेकर रीचेक करने  लगी। सात-आठ घर करने के बाद मैंने पाया कि यहाँ के बच्चे विद्यालय बहुत ही कम जाते हैं और पढ़ाई की स्थिति संतोषजनक भी नहीं है। माता-पिता को भी बच्चों को विद्यालय भेजने या पढ़ाने में कोई रुचि नहीं थी। गाँव के अधिकतर लोग मज़दूरी करते हैं। लोगों का कहना था कि कमाएंगे नहीं तो खायेंगे क्या? जैसे ही मैंने नौवें घर का रीचेक शुरु किया उस घर में मुझे मुनियामिली जो मुझे कुछ देर पहले रास्ते में मिली थी। वह 10-15 बच्चों को ट्यूशन पढ़ा रही थी। मैं यह देखकर आश्चर्यचकित रह गयी।

मुनिया खु़द कक्षा-नौ में पढ़ती है। वह अपने चार भाई-बहन व माँ के साथ रहती है। अपने पिता के मृत्यु के बाद घर की पूरी जि़म्मेदारी उसने संभाल ली है। वह सुबह दूसरे गाँव में ट्यूशन पढ़ने जाती है और शाम को गाँव के बच्चों को ट्यूशन पढ़ाती है। रीचेक करने के लिए उसने मुझे पूरा गाँव घुमाया। मैंने उससे एक सवाल किया आप कैसे घर की जि़म्मेदारीयों के साथ अपनी पढ़ाई भी कर लेते हो इतने पिछड़े गाँव में जहाँ यातायात का साधन भी नही है लोग लड़कियां को घर से कहीं ओर जाने नहीं देते? जवाब में उसने मुझ से कहा – काबिल हम भी हैं केवल दाढ़ी मूंछ नहीं

इतनी कम उम्र में इतनी बड़ी जि़म्मेदारी को निभाते देख मैं मुनिया से काफी प्रभावित हुई। यह दिन मेरे लिए असर 2014 का काफी यादगार साबित हुआ।


Arzoo Swaraj, ASER Regional Team, Bihar

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