Day 99: स्कूल में बच्चों की केयर

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कुछ दिन पहले मेरी मुलाक़ात रुद्रप्रयाग ज़िले (उत्तराखंड) के एक प्राइमरी स्कूल की महिला शिक्षिका से हुई| उन्होंने ने मुझे महिला अध्यापिकाओं को मिलने वाली दो वर्ष की चाइल्ड केयर लीव का बच्चों की पढ़ाई पर होने वाले प्रभाव के बारे में बताया|
चाइल्ड केयर लीव के अंतर्गत महिला अध्यापिकाओं को अपने बच्चों की देखभाल के लिए पुरे करियर में अधिकतम 2 वर्षों (730 दिन) का अवकाश मिलता है| उत्तराखंड राज्य में जहाँ शिक्षकों की भारी कमी है, चाइल्ड केयर लीव की सही व्यवस्था न होने के कारण बच्चों की शिक्षा पर दुष्प्रभाव पड़ रहा है| बहुत से शिक्षक इस अवकाश का गलत तरह से प्रयोग कर रहे हैं|
उन शिक्षिका का कहना था कि – “यह बिलकुल ज़रूरी है कि अपने बच्चों का पालन-पोषण ठीक प्रकार से हो परन्तु जो बच्चे स्कूल में आ रहे हैं वो भी तो हमारे बच्चे ही हैं और इनका पालन-शिक्षण भी ठीक प्रकार से हो यह भी हमारी ज़िम्मेदारी है| अपने बच्चों के लिए हम स्कूल में पढ़ने आ रहे बच्चों का भविष्य दांव पर नहीं लगा सकते| बहुत ज़्यादा ज़रुरत पड़ने पर ही इस चाइल्ड केयर लीव का प्रयोग किया जाना चाहिए| चाइल्ड केयर लीव के दौरान विभाग द्वारा किसी दूसरे अध्यापक की व्यवस्था भी नहीं की जाती है| विभाग को इस समस्या की गंभीरता को समझते हुए समस्या के समाधान में कुछ विशेष कदम उठाने चाहिए|”
आप ही सोचिए यदि किसी स्कूल में दो ही अध्यापक हों और उनमें से एक भी अगर इस तरह से मिलने वाली लम्बी लीव पर चला गया तो बच्चों की शिक्षा पर क्या असर पड़ेगा| क्या ऐसे में स्कूल में बच्चों की केयर के लिए कुछ ज़रूरी कदम नहीं उठाने चाहिए?
 Peeyush Sharma, ASER, Uttrakhand
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