Devendra Sharma – असर का सफ़र

dमैं देवेन्द्र कुमार शर्मा असर 2014 सर्वे के लिए असर मास्टर ट्रेनर कमल कुमार लड़ना के साथ डूंगरपुर गया था | हमने डूंगरपुर जिले का असर सर्वे जिला सहभागी राज नोवल्स डिग्री कॉलेज के छात्र – छात्राओं से करवाया| राज नोवल्स डिग्री कॉलेज में हमने तीन दिवसीय प्रशिक्षण दिया गया | डूंगरपुर में हुए कुछ अनुभव मैं आप सब से साझा करना चाहता हूँ |

डूंगरपुर जिला आदिवासीयों के क्षेत्र से आता है और यह गुजरात राज्य की सीमा पर पहाड़ी क्षेत्र पर छोटा सा जिला हैं | यहाँ पर ग्रामीण क्षेत्रों के लोगों का रहन-सहन, खान-पान और वेश-भूषा हमारे क्षेत्र राजस्थान से अलग है | यहाँ पर लोग सतत रूप में नहीं रहते बल्कि अलग – अलग पहाड़ी पर घास-फूस के कच्चे घर बनाकर रहते हैं| पहाड़ी क्षेत्र वाले लोगों के घरों में न तो लाइट होती है न ही साफ़ सफाई होती है | यहाँ के लोग खान-पान में सब्जियों में कंद मूल एवं फल के साथ मक्का और चावल का ज्यादा उपयोग करते हैं | यहाँ बागड़ी भाषा बोली जाती है जिसमें गुजराती भाषा का प्रभाव दिखाई देता है | यहाँ की वास्तुकला अपने आप में बेजोड़ है तथा वास्तुकला की विशेष शैली के लिए जाना जाता है | यहाँ की संस्कृति में औरतों और पुरुषों में कोई अंतर नहीं किया जाता हैं और लड़के और लड़कियों को अपने मन पसंद जोड़ी चुनने की आजादी होती है | यहाँ पर अन्य क्षेत्र की तुलना में समतल क्षेत्र कम है और इस सीमित कृषि क्षेत्र में चना, चावल, सोयाबीन और मक्का प्रमुख फसल पैदा की जाती हैं | यहाँ भेड़ और बकरियां और गायें का पशुपालन करके दूध उत्पादन किया जाता है | यहाँ पर जंगल बहुत हैं जिसमें सागवान के वृक्ष पाये जाते है एवं लकड़ियाँ, वनस्पति प्रचुर मात्रा में पाया जाता है | यहाँ के लोग जंगल की लकड़ियों को काटकर उन्हें बेचकर अपना जीवनयापन करते हैं | ग्रामीण क्षेत्रों में बिजली व्यवस्था नहीं है और लोग आज भी अँधेरे में अपना जीवनयापन करते हैं | गाँव तक पहुँच के लिए सड़कें नहीं हैं, सिर्फ कच्चे रास्ते हैं जिस पर सरकारी बसों की सेवा नहीं पहुँच पाई है जिससे लोगों को गांव पहुंचें में बहुत समस्या रहती है | जीपों के माध्यम से यातायात की व्यवस्था है जो समय-समय पर गाँव से शहर आती-जाती है | जीप में पुरुष और महिला औसत 50-60 भर कर जाते है वे अपने जीवन जीने की भी परवाह नहीं करते है-गाडियों का अभाव होने के कारण लोग भरी हुई गाड़ी में ऊपर-नीचे और चारों तरफ़ लटक-लटक कर यात्रा करते हैं | गाड़ी के ड्राइवर को केवल देखने के लिए आगे जगह छोड़ते है,  बोनट पर भी औरत और पुरुष बैठ जाते है |

यहाँ पर लोग आज भी तीर-बाण के द्वारा अपना शिकार करते है | यहाँ का क्षेत्र शिक्षा में पिछडा हुआ है जिससे लोग अपने बच्चों को शिक्षा की बजाय उनसे कार्य करवा पैसे पाना चाहते है | यही कारण है कि लोगों में जागरूकता की कमी रहती है और लोग शिक्षा को महत्त्व नहीं देते हैं | मुझे लगता है कि प्रथम जैसी संस्थान को डूंगरपुर जिले और आदिवासी क्षेत्रों में कार्य करने की आवश्यकता है जिससे लोगों को शिक्षा के साथ – साथ अपने जीवन की आवश्यकता की वस्तुओं के बारे में जागरूक हो सके |

Devendra Sharma

ASER Associate, Rajasthan