Sunil Kumar – “असर के सफर का असर ”

img_7794असर सेंटर में “असर 2010” मेरा असर का पहला साल था | हालांकि इसके पहले भी मुझे असर सर्वे करने का मौका मिला था | पर असर 2010 मेरे लिए कुछ मायनो में बहुत ही ख़ास था जैसे नए-नए लोगो से मिलना, अन्य स्थान पर जाना  तथा परिस्थितियों पर स्वयं निर्णय लेना आदि |

उत्तर प्रदेश भारत का सबसे बड़ा राज्य है जहाँ  हर साल लगभग  70  जिलों  का सर्वे होता रहा है | अगर आप सहारनपुर से बलिया जाने के लिए ट्रेन से सफ़र करते है तो आपको लगभग 1000 KM दूरी तय करनी पड़ेगी | पूर्वांचल, बुन्देखंड तथा पश्चिमी उत्तर परदेश के बोल-चाल, रहन सहन, पढाई-लिखाई में विविधता देखने को मिलेगी | इतने बड़े राज्य में असर सर्वे करवाना हमेशा चुनौती पूर्ण कार्य रहा है | इन चुनौतियों का सामना करने में हमेशा यहाँ ग़ाव में रहने वाले बच्चें ,अध्यापक, सरपंच, कालेज, तथा ग़ाव के लोगो का भरपूर साथ मिलता रहा है | साथ ही साथ हमारे उन सभी सीनियर साथियों का अथक सहयोग रहा है जिनके बिना असर का सफर आसान नहीं था |  मैं इन सभी को बहुत – बहुत धन्यवाद देना चाहता हूँ अन्यथा भारत के नागरिकों द्वारा किया जाने वाला भारत का यह सबसे बड़ा सर्वे शायद सफ़ल नहीं हो पाता |

यह वही लोग है जिनके सहयोग से असर ने अपना सुनहरा सपना “10 साल” पूरा किया तथा अपने परिणामों से सरकार, अभिभावक अन्य संगठनों को आईना दिखाते हुए भारत के भविष्य अर्थात बच्चों की पढाई-लिखाई के बारे में सोचने के लिए मजबूर कर दिया | सरकार आती है चली जाती है, नीतियां बनती है पूरी हो जाती है पर क्या बच्चे स्कूलों में सीखते है – यह आईना दिखाता है भारत के नागरिकों का अपना असर | जमीनी हकीकत को दिखाता इस असर की आलोचना करने वाले भी मिले, साथ ही साथ समर्थन करने वाले भी मिले पर हमें पता था असर का यह रास्ता कठिन है | लोग मिलते गए असर का सफर आसन होता गया |

skअसर की इस यात्रा में मुझे अलग-अलग, अनेको अनुभव प्राप्त हुए जो प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से मुझें प्रोत्साहित करते रहे  | यहाँ कुछ अनुभब को साझा करने का प्रयास कर रहा हूं |वाराणसी जिले में एक ग़ाव जो दो साल लगातार सर्वे में शामिल रहा और उस ग़ाव का एक “चयनित घर” जो कि दोनों साल सर्वे में शामिल था के बच्चों का रीचेक करने का मौका मिला | मुझे तो याद नहीं था पर जैसे ही घर में पंहुचा तो बच्चें तथा घर के लोग पहचान गए |

घर के मुखिया- अरे भाई आप एक बार और आये थे पर आप तभी आते है जब सर्वे समाप्त हो जाता है आज पुनः आप आ गए | कहा चले जाते है | हमने सोचा था आप पुनः आयेगे पर आये नहीं |

मैं – भाई कैसे बताऊँ कई और काम में व्यस्त हो जाता हूँ | पर हमें आप लोगों से मिल कर ख़ुशी हुई  और आप पहचान गए यही तो असर का असर है अन्यथा लम्बे समय के बाद कौन पहचानता है |

घर के मुखिया – आप को याद भी होगा कि मेरा आप से इस बात पर बहस हुआ था कि इतना आसन सवाल आप बड़े बच्चों से क्यों पूछते हो | यह तो सब कर सकते है | आपने मेरे बड़े लड़के की भी जाँच की थी जो भाग का सवाल नहीं हल कर पाया था जबकि वह 72% अंक से 12वी पास किया था  | मैं कैसे भूल सकता हूँ ? मैं तो समझता था कि यह तो अच्छे मार्क से पास है, इसे तो सब पता ही होगा | उस दिन का असर मेरे ऊपर असर कर गया था और अब तो मैं अपने घर के सभी  बच्चों की पढाई-लिखाई को लेकर बहुत ही चौकन्ना रहता हू |

72% मार्क से 12वी पास बच्चें का आसान भाग का सवाल हल न कर पाना शिक्षा तंत्र के लिए प्रश्न खड़ा कर गया था | मुझे घर के लोगों का उसी तरह पुनः सहयोग मिलना मेरे लिए ख़ास था |

एक और अनुभव साझा करना चाहता हूँ | उत्तर प्रदेश का सहारनपुर जिला जो अपने आप में लकड़ी के काम के लिए ख्याति प्राप्त है | मैं असर 2012 के दौरान लखनऊ से चलकर सुबह 7 बजे सहारनपुर रेलवे स्टेशन पहुंचा | जिले की चयनित संस्था के सचिव को फ़ोन मिलाना शुरू करते है | संस्था के हेड का फ़ोन बंद मिलता है और यह फ़ोन लगातार २ दिनों तक बंद रहा | मैं तो बहुत ही परेशान था (भाई परेशान तो होना ही था क्योंकि कम समय में सर्वे तथा रिपोर्ट जारी करने की जो हमारी खासियत रही है) यह सोच रहा था अब क्या करें ? तीसरे दिन मेरी मुलाकात चाय के दुकान पर   एक संज्जन से हुई  |

संज्जन – आप तो बिहार के लगते हो, यहाँ क्या कर रहे है ?

मै –“नहीं सर मैं तो उत्तर प्रदेश का ही हूँ | एक काम के लिए यहाँ आया हूं पर जिनके यहाँ आया था उनका फ़ोन बंद है, बात नहीं हो पा  रही है” |

संज्जन – अच्छा बताओ क्या काम है ?

मैं – असर सर्वे योजना को उनके साथ साझा किया | असर सर्वे की खासियत सुन कर वे तुरंत सर्वे में सहयोग करने का वादा कर दिए  पर क़ब  से शुरू होगा यह सुनिश्चित नहीं हो पाया |

अगले दिन सुबह 6 बजे मेरे फ़ोन की घंटी बजती है तथा सूचना मिलती है कि आप को 9 बजे ट्रेनिग सेंटर पहुचना है और यह आवाज़ उन्हीं सज्जन की थी जो एक दिन पहले मिले थे |

मैं अवाक रह गया ! ‘ऐसे कैसे अचानक ट्रेनिंग में जाना है’, मैंने अपने साथी मास्टर ट्रेनर को बोला |

ट्रेनिंग हॉल का दृश्य – ट्रेनिंग हाल में लगभग 35 लोगो बैठे हैं तथा आपस में बातचीत कर रहे हैं | अब क्या होना है किसी को कुछ भी नहीं पता | पार्टनर ने पहला  सत्र अपनी संस्था का परिचय देते हुए असर के महत्व को बताना शुरू किया | ट्रेनिग हॉल में सन्नाटा पसर गया तथा लोग उनकी बातो को बड़े ध्यान से सुन रहे थे | पार्टनर के द्वारा लिया गया यह सत्र इतना मोटिवेशन भरा था कि लोगो ने एक स्वर में बोला कि हमें तो यह सर्वे करना है इसके लिए आप पैसे दे या न दे पर हमें करना ही है | अगले तीन दिन तक ट्रेनिंग हाल प्रतिभागियों से भरा रहा और लोंगो ने बड़ी ईमानदारी के साथ बेहतरीन सर्वे किया|पार्टनर ने ट्रेनिंग और सर्वे का धनराशी  ख़ुद अपने पास से दिया | हालांकि निर्धारित सर्वे का धनराशी असर सेंटर के द्वारा कुछ दिन के बाद पार्टनर को भुगतान किया गया |

बातोँ-बातोँ में एक  दिन मैंने पार्टनर से पूछा आप अचानक इतना विश्वास करते हुए कैसे यह सब कर दिए  |

पार्टनर ने जबाब दिया, सर, सामने वाले का अगर उदेश्य तथा नियत सही हो तो काम में विश्वास तो करना ही पड़ता है | वैसे भी हमारी जिले के बच्चों की पढ़ने लिखने की स्थिति क्या है यह यहाँ के लोगो को भी जानना जरुरी है | समाज में ऐसे बहुत ही सारे लोग उपलब्ध है जो कुछ करना चाहते है पर सही व्यक्ति तथा सही समय का चुनाव नहीं कर पाते | हमें ऐसे लोगो से मिलना बहुत जरुरी है ताकि उन्हे  कुछ काम करने का मौका मिले | इसके साथ-साथ आप की संस्था के साथ मेरे संस्था का नाम जुड़ना भी मेरे लिए काफी महत्वपूर्ण था |

ऐसे बहुत से अनुभव हमें इस असर के सफ़र में मिले जो सफ़र को आसन बनाने की प्रेरणा देते रहे है |

Sunil Kumar

ASER Team, UP