Dileep Kumar – एक दिन ऐसा भी

dभारत में शिक्षा के क्षेत्र में किया जाने वाला सबसे बड़ा वार्षिक सर्वेक्षण ‘असर’ हैं, जो पूरे भारतवर्ष में नागरिकों के द्वारा किया जाता है I मैंने उत्तर प्रदेश असर टीम में जुलाई 2013 से कार्य करना शुरू किया था | इसी समय से ही पूरे भारतवर्ष में असर की पूरी तैयारियां शुरू हो चुकी होती है | हमें भी इसी दौरान उत्तर प्रदेश में असर के लिए कार्य करने का अवसर मिला I इसके पहले भी मैंने असर के बारे में सुना था, लेकिन ये हमें नही पता था कि इसकी प्रक्रिया क्या है | ये सभी प्रक्रियाएँ हमने असर की नेशनल वर्कशॉप तक सिख ली थी | साथ ही सर्वे की बारीकियां से भी अच्छी तरह से परिचित हो चुका था I उत्तर प्रदेश में असर 2013 का सर्वेक्षण DIET के द्वारा समय सीमा के अन्दर ही समाप्त हो चुका था और सभी स्टेट की असर टीम को दूसरे स्टेट में असर सेंटर रीचेक के  लिए जाना था I असर सर्वे में सर्वे की प्रक्रिया में मोनिटरिंग और रीचेक यह दो काफी महत्वपूर्ण प्रक्रिया हैं जिससे सर्वे की गुणवत्ता को सुनिश्चित करने में काफी मदद मिलती है l

दिसम्बर के महीने में हमे असर सेंटर रीचेक के लिए उत्तराखंड जाना था I उस समय ठण्ड बहुत जोरो से पड़ रही थी और पहाड़ी इलाकों में तो और अधिक I मैं और मेरे टीम के एक साथी उत्तराखंड के अल्मोड़ा जिले में गए I इसके पहले मैं कभी ऐसी जगह नही गया था जहाँ पर 10-20 कि0 मी0 की दूरी तय करने के लिए भी घंटो सफ़र करना पड़ता था I मैं कभी पहाड़ो के बिच नही रहा था और न ही पहाड़ो पर चढ़ने-उतरने का अनुभव ही था I वहां के अधिक्तर गाँव पहाड़ो के बिच या घाटियों में ही बसे हुए थे I

एक दिन मैं रीचेक के लिए प्रातः 9 बजे एक गाँव के लिए निकला I गाँव काफी दूर था और वहां वाहनों के आने जाने के लिए निश्चित समय ही था I मैं तीन बार वाहन बदलने के बाद गाँव से करीब 2 km. पहले ड्राईवर ने अपने गन्तव्य स्थान पर ड्राप किया I उस समय करीब 3 बजने वाले थे I जहाँ पर ड्राइवर ने हमें ड्राप किया वहां से गाँव पहाड़ो में निचे 2-2.5 km. की दूरी पर था I मैं वहां से लोगो से पूछते हुए उस गाँव में पंहुचा I गाँव पहुचने के बाद मैंने सर्वेक्षण किये गए घरों में रीचेक किया I वहां के लोगो को असर के बारे में अच्छी तरह से पता था क्योकि सर्वेयर ने असर करने के उद्देश्य लोगों को बताया था I उस समय घडी में लगभग 5 बज चुके थे और अँधेरा होने वाला था I जब मैं गाँव से निकल रहा था तो वहां के लोगो ने हमे बताया कि जिस रास्ते से आप आये हैं उससे कम समय में आप दुसरे रास्ते से ऊपर चोटी पर आसानी से पहुँच सकते हैं I हमें नीचे पहाड़ों के बीच जाने में कोई समस्या तो नही हुई थी लेकिन जब मैं पहाड़ो के बिच से ऊपर की तरफ आने लगा उस समय दिक्कत तो हो रही थी |  उसके साथ ही आगे दो रास्ते होने के कारण मैं रास्ता भटक गया था I शाम भी हो चुकी थी और हमे कही भी दिखाई नही दे रहा था जिससे हम रास्ते का पता लगा सकते  I मैं चलता ही जा रहा था लेकिन कुछ समझ में नही आ रहा था कि किधर जाएँ | तभी उसी रास्ते पर एक बाबा की कुटिया दिखाई पड़ी और मैंने उनसे मदद मांगते हुए अपना परिचय दिया और अपने आने का उद्देश्य स्पष्ट किया I बाबा जी ने हमे पानी पिलाया और ऊपर चोटी पर पहुंचाए I

ऊपर चोटी पर पहुँचते समय 6 बज चुके थे और उस समय कोई वाहन भी उपलब्ध नहीं था I अंततः एक व्यक्ति ने हमें अपनी गाड़ी के साथ 20 km. की दूरी पर एक क़स्बे में पहुँचाया और एक ऐसी जगह की व्यस्था भी कराई जहाँ पर उस रात आसानी से काटी जा सकती थी I अगले दिन प्रातः मैं रानीखेत पहुंच गया I

असर यात्रा में हुआ यह अनुभव मुझे हमेशा याद रहेगा और मुझे प्रेरित करता रहेगा | मैं अपने एवं असर के इतने वर्षो के अनुभव के आधार पर यही कहना चाहूँगा कि किसी भी बच्चे के माता – पिता यह नहीं चाहते हैं कि उनका बच्चा अनपढ़ रहे चाहे वह व्यक्ति रिक्शा चलने वाला ही क्यों न हो | हमे अपने कार्य पर गर्व है क्योंकि असर प्रत्येक वर्ष कम से कम सरकार को यह तो आइना दिखता है कि उनके द्वारा शिक्षा के क्षेत्र में किये गए व्यय का कुछ परिणाम हासिल हो रहा है या नहीं I हम कोशिश करेंगे की हम अपना असर तब तक जारी रखेंगे जब तक बच्चों के पढ़ने के स्तर में गुणवत्ता न आ जाये I

Dileep Kumar

ASER Associate, Uttar Pradesh

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